Saturday, February 18, 2012

राजश्री साहू महाराज(Sahu Maharaj:1874-1922)

राजश्री  छत्रपति साहू महाराज (1874-1922)  

 कुछ लोग होते हैं कि राजा-महाराजाओं की चारदीवारों से कूद कर झोपड़ियों तक जा पहुँचते हैं और वहां ऐसे दिए  रोशन करते हैं कि आने वाली इतिहास की  सैकड़ों और हजारों परतें भी उस रोशनाई को दबा नहीं पाती. कोल्हापुर के महाराजा राजश्री साहू महाराज ऐसे ही व्यक्तित्व के धनी थे. एक स्टेट के शासक होकर उन्होंने जो कार्य किया, वह नूतन था, अभिनव और अनुकरणीय था.

राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज का  जन्म 26 जून 1874 में हुआ था. उनके बचपन का नाम यशवंत रॉव था।  बाल्य-अवस्था में ही बालक यशवंतराव को छत्रपति साहू महाराज की हैसियत से कोल्हापुर रियासत की राजगद्दी को सम्भालना पड़ा था.
छत्रपति साहू महाराज  की माता राधाबाई मुधोल राज्य की राजकन्या थी। पिता जयसिंग रॉव उर्फ़ अबासाहेब घाटगे कागल निवासी थे।  उनके दत्तक पिता शिवाजी चतुर्थ व दत्तक माता आनंदी बाई थी। राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज केवल 3  वर्ष के थे तभी उनकी सगी माँ राधाबाई 20  मार्च 1977  को मृत्यु को प्राप्त हुई। छत्रपति संभाजी की माँ का देहांत बचपन में ही हुआ था।  इसलिए उनका लालन-पालन जिजाबाई ने किया था। छत्रपति साहू महाराज की उम्र जब 20  वर्ष थी, उनके पिता अबासाहेब घाटगे की मृत्यु(20  मार्च 1886 )  हुई थी।

छत्रपति शिवाजी महाराज ( प्रथम) के दूसरे पुत्र के वंशज शिवाजी (चतुर्थ ) कोल्हापुर में राज्य करते थे. ब्रिटिश षडयंत्र और अपने ब्राह्मण दीवान की गद्दारी की वजह से जब शिवाजी (चतुर्थ ) का कत्ल हुआ तो उसकी विधवा आनंदीबाई ने अपने एक जागीरदार अबासाहेब घाटगे के पुत्र यशवंतराव को 17  मार्च सन 1884  में गोद लिया था. अब उनका नाम शाहू छत्रपति महाराज हो गया था।

छत्रपति शाहू महाराज की शिक्षा राजकोट के राजकुमार विद्यालय में हुई थी।  प्रारंभिक शिक्षा के बाद आगे की पढ़ाई  रजवाड़े में ही एक अंग्रेज  शिक्षक 'स्टुअर्ट मिटफर्ड फ्रेज़र ' के जिम्मे सौपी  गई थी।  अंग्रेजी शिक्षक और अंग्रजी शिक्षा का प्रभाव छत्रपति शाहू महाराज के दिलों-दिमाग पर गहराई से पड़ा था।  वैज्ञानिक सोच को न सिर्फ वे मानते थे बल्कि इसे बढ़ावा देने का हर संभव  प्रयास  करते थे। पुरानी प्रथा, परम्परा  अथवा काल्पनिक बातों को वे महत्त्व नहीं देते थे।

छत्रपति शाहू छत्रपति महाराज का विवाह 17 वर्ष की उम्र में 1 अप्रेल 1891 को  बडौदा के मराठा सरदार  गुणाजी रॉव खानवीकर की बेटी लक्ष्मीबाई से हुआ था. उनका राज्याभिषेक  2 अप्रेल सन 1894 को 20  वर्ष की उम्र में हुआ था।

राज्य की रियासत का नियंत्रण अपने हाथ में लेते ही छत्रपति साहू महाराज ने सर्व प्रथम बलात-श्रम की प्रथा को ख़त्म करने का आदेश निकाला था.उस समय देश के अन्य हिस्सों की तरह कोल्हापुर में भी ब्राह्मणों का एक-छत्र राज था.
   छत्रपति साहू महाराज हर दिन बड़े सबेरे ही पास की नदी में  स्नान करने जाया करते थे. परम्परा से चली आ रही प्रथा के अनुसार, इस दौरान ब्राह्मण पंडित मंत्रोच्चार किया करता था. एक दिन बंबई से पधारे प्रसिध्द  समाज सुधारक राजाराम शास्त्री भागवत भी उनके साथ हो लिए  थे. घटना 1899  के नव. माह की है। महाराजा कोल्हापुर के स्नान के दौरान ब्राह्मण पंडित  द्वारा मंत्रोच्चार किये गए श्लोक सुन कर राजाराम शास्त्री अचम्भित रह गए. पूछे जाने पर ब्राह्मण पंडित ने कहा की चूँकि महाराजा शूद्र  हैं, इसलिए वे वैदिक मंत्रोच्चार न कर पौराणिक मंत्रोच्चार करते है. ब्राह्मण पंडित की बातें साहू महाराज को अपमानजनक लगी. उन्होंने इसे एक चेलेंज के रूप में लिया.
  महाराज के सिपहसालारों ने एक प्रसिध्द ब्राह्मण पंडित नारायण भट्ट सेवेकरी को महाराजा का यज्ञोपवित संस्कार करने को राजी किया.यह सन 1901  की घटना है. जब यह खबर कोल्हापुर के ब्राह्मणों को हुई तो वे बड़े कुपित हुए. उन्होंने नारायण भट्ट  पर कई तरह के पाबंदी लगाने की धमकी दी. तब, इस मामले पर साहू महाराज ने राज-पुरोहित से सलाह ली. मगर, राज-पुरोहित ने भी इस दिशा में कुछ करने में अपनी असमर्थता प्रगट कर दी. जब यह बात फैली तो लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने ब्राह्मणों का पक्ष लेते हुए साहू महाराज की निंदा की थी. साहू महाराज ने गुस्सा हो कर राज-पुरोहित को बर्खास्त कर दिया.

सन 1902  के मध्य में छत्रपति साहू महाराज इंग्लैण्ड गए हुए थे. उन्होंने वही से एक आदेश जारी कर कोल्हापुर  राज्य के अंतर्गत शासन-प्रशासन की  50 %  सीटें पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित कर दी. महाराजा के इस आदेश से कोल्हापुर के ब्राह्मणों पर जैसे गाज गिर गयी. स्मरण रहे, सन 1894  में जब  उन्होंने राज्य की बागडोर सम्भाली थी, कोल्हापुर के सामान्य प्रशासन में  कुल 71  पदों में से  60  पर ब्राह्मण अफसर बैठे थे. इसी प्रकार  500 लिपिकीय  पदों में से मात्र 10  गैर-ब्राह्मण थे. परन्तु पिछड़ी जातियों को अवसर उपलब्ध कराने के कारण सन 1912  में 95  पदों में से गैर-ब्राह्मण अफसरों की संख्या  35  पहुँच गयी थी.

जैसे ही पिछड़ी जातियों को आरक्षण देने का आदेश प्रसारित हुआ, पडोसी  राज्यों के ब्राह्मणों को भी भारी कष्ट हुआ था। ऍड गणपत रॉव अभ्यंकर जो सांगली की पटवर्धन रियासत में मुनीम  था, कोल्हापुर आकर छत्रपति साहू महाराज  से जाति  पर आधारित आरक्षण न देने को कहा । छत्रपति साहू महाराज,  ब्राह्मण गणपत रॉव अभ्यंकर को लेकर अपने घोड़ों के अस्तबल गए। अस्तबल के सभी घोड़े उनके मुँह बंधे थैले के चने खा रहे थे। यह नज़ारा देख राजर्षि छत्रपति साहू महाराज ने आदेश दिया कि घोड़ों के मुँह में बंधे थैले खोल कर उनमें रखे चनों को नीचे एक बड़ी दरी में डाल दिया जाय ।
आदेश का पालन होने के थोड़ी ही देर बाद जो तगड़े घोड़े थे , वे अपने से कमजोर किस्म के घोड़ों को परे ढकेलते हुए दरी में रखे चनों पर फिर से टूट पड़े किन्तु जो कमजोर किस्म के घोड़े थे , वे ताकतवर घोड़ों की दुलत्ती के बाहर होकर एक ओर खड़े हो गए। यह तमाशा देख राजर्षि छत्रपति साहू महाराज ने ब्राह्मण गणपत रॉव अभ्यंकर से कहा - अभ्यंकर ! इन कमजोर घोड़ों को मैं क्या करूं ?  उन्हें गोली मार दूँ ? अभ्यंकर को समझ नहीं आ रहा था की राजर्षि छत्रपति साहू महाराज को क्या कहे !

    सन 1903  में साहू महाराज ने  कोल्हापुर स्थित  शंकराचार्य मठ की सम्पत्ति  जप्त करने का आदेश दिया था. दरअसल, मठ को राज खजाने से भारी मदद दी जाती थी. कोल्हापुर के पूर्व महाराजा के द्वारा अग. 1863  में प्रसारित एक आदेश के अनुसार, कोल्हापुर स्थित मठ के शंकराचार्य को अपने उत्तराधिकारी की नियुक्ति से पहले महाराजा से अनुमति लेनी आवश्यक थी. परन्तु,  तत्कालीन शंकराचार्य उक्त आदेश को दरकिनार करते हुए संकेश्वर मठ में रहने चले गए थे, जो कोल्हापुर रियासत के बाहर था. 23 फर. 1903  को शंकराचार्य ने अपने उत्तराधिकारी की नियुक्ति की थी. यह नए शंकराचार्य, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के करीबी थे. जुला. 10 , 1905  को इन्हीं शंकराचार्य ने घोषणा की कि चूँकि, कोल्हापुर भोसले वंश की जागीर रही है, जो कि क्षत्रिय घराना था. इसलिए राज गद्दी के उत्तराधिकारी साहू महाराज स्वाभविक रूप से क्षत्रिय है.
    इसी तरह की एक और बड़ी मजेदार घटना है. ब्राह्मणों से तंग आकर एक बार महाराजा कोल्हापुर ने एक  आदेश में कहा था कि चूँकि, ब्राह्मणों का पेशा पूजा-पाठ और शास्त्रीय-चर्चा है. अत: कोल्हापुर रियासत के ब्राह्मण मंत्रियों, हाकिमों, सेनापतियों, और दूतों को उनके पदों से हटा कर शास्त्र-शिक्षादी कामों में लगाया जाता है.क्योंकि, मनुस्मृति के अनुसार, यह सुनिश्चित करना राजा का यह कर्त्तव्य है. ब्राह्मणों ने रो-गा कर बड़ी मुश्किल से साहू महाराज से क्षमा मांगी थी.
    हिन्दू समाज चातुर्य-वर्ण व्यवस्था के तहत चार वर्गों में विभाजित था. चारों वर्णों के अधिकार और कर्त्तव्य निश्चित थे.सबसे ऊपर ब्राह्मण थे. ब्राह्मणों का काम शिक्षा प्राप्त करना, पूजा तथा पंडिताई करना और राज-सत्ता को सलाह देना था. क्षत्रियों का कार्य राज्य की रक्षा करना था. वैश्यों का काम व्यापार और शूद्रों का लोगों की सेवा करना था. एक पांचवा वर्ण और था, अति-शूद्र. अति-शूद्र में अस्पृश्य जातियां आती थी. अस्पृश्य जातियों का काम साफ़-सफाई था.
     शूद्रों और अति-शूद्रों की संख्या अधिक थी मगर, शासन-प्रशासन में उनकी भागीदारी नहीं थी. सेवा के बदले उन्हें मजदूरी पाने का अधिकार भी नहीं था. जो कुछ मिलता, उसी में संतुष्ट रहना था. यह हिन्दू धर्म और उनके दर्शन का विधान था. इस विधान का पालन करवाना राज्य का कर्तव्य था.राजा ब्राह्मण मंत्रियों की राय मानने के लिए बाध्य था.ब्राह्मणों ने समाज और राज-सत्ता में खुद को पवित्र और श्रेष्ठ घोषित कर रखा था. यद्यपि ब्राह्मणों की संख्या 3 %  थी मगर, शासन-प्रशासन में  75 से 100 %  तक ब्राह्मण होते थे. राज्य और समाज की यह व्यवस्था सदियों से चली आ रही थी. इस व्यवस्था को जो तोड़ने का प्रयास करता, राजसत्ता द्वारा सख्ती से कुचल दिया जाता था.
      लोगों में यह आम धारणा होती थी कि राज-शासन चलाने के लिए किसी राज-वंश में पैदा होना जरुरी है और शायद इसलिए, राजकुमारों का पालन-पोषण विशेष ढंग से किया जाता था. यद्यपि यह मिथक कुछ  मौकों पर टूटा है. मगर, ऐसा कम ही हुआ है. बहरहाल, मंत्री ब्राह्मण और राजा भी ब्राह्मण या क्षत्री हो तो किसी को कोई दिक्कत नहीं थी. मगर, राजा की कुर्सी पर वैश्य या फिर शुद्र वर्ण का कोई शख्स बैठा हो तो दिक्कत स्वभाविक होनी थी. छत्रपति साहू महाराज, क्षत्रिय नहीं, शूद्र मानी गयी जातियों में आते थे.स्पष्ट है, छत्रपति साहू महाराज की परेशानियों को समझा जा सकता है. कोल्हापुर रियासत के शासन-प्रशासन में पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व नि;संदेह उनकी अभिनव पहल थी. ?
    राजश्री छत्रपति साहू महाराज ने यही नहीं किया बल्कि, पिछड़ी जातियों समेत समाज के सभी वर्गों मराठे, महार, ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य, क्रिश्चियन, मुस्लिम और जैन सभी के लिए अलग-अलग सरकारी संस्थाए खोलने की पहल की. साहू महाराज ने उनके लिए स्कूल और छात्रावास खोलने के आदेश जारी किये. जातियों के आधार पर स्कूल और छात्रावास असहज  लग सकते हैं. मगर, नि;संदेह यह अनूठी पहल थी उन जातियों को शिक्षित करने के लिए जो सदियों से उपेक्षित थी. उन्होंने दलित-पिछड़ी जातियों के बच्चों की शिक्षा के लिए खास प्रयास किये थे. उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई थी. साहू महाराज के प्रयासों का परिणाम उनके शासन में ही दिखने लग गया था.स्कूल और कालेजों में पढने वाले पिछड़ी जातियों के लडके/लडकियों की संख्या में उल्लेखनीय प्रगति हुई थी.
      कोल्हापुर के महाराजा के तौर पर साहू महाराज सभी जाति और वर्गों के लिए काम कर रहे थे. उन्होंने 'प्रार्थना समाज' के लिए उतना ही काम किया था. राजाराम कालेज का प्रबंधन उन्होंने 'प्रार्थना समाज' को दिया था. वेदाध्ययन के लिए उन्होंने स्कूल खोला था. ब्राह्मण समाज के विद्यार्थियों के लिए उन्होंने अलग से स्कूल और छात्रावास खोले थे.
     सामाजिक न्याय के इस कार्य में उन्हें कितना विरोध का सामना करना पड़ा, यह तो हम देख चुके हैं. एक बार लोकमान्य तिलक गुट की ओर से उन्हें जान से मारने की  धमकी मिली थी. इस पर उन्होंने कहा था कि वे गद्दी छोड़ सकते हैं मगर, अपने सामाजिक प्रतिबध्दता के कार्यो से वे पीछे नहीं हट सकते.यह अलग बात है कि जब तिलक पूना के अस्पताल में भर्ती है, वे देखने गए थे ताकि उनका इलाज बेहतर ढंग से हो सके. विरोधियों के प्रति ऐसा सौम्य व्यवहार, राजश्री छत्रपति साहू महाराज ही कर सकते थे.
      अप्रेल 15 ,  1920  को नाशिक में 'उदोजी विद्यार्थी' छात्रावास नीव का पत्थर रखते हुए साहू महाराज ने कहा था कि जातिवाद का अंत जरुरी है. जाति को समर्थन देना अपराध है.हमारे समाज की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा जाति है.जाति आधारित संगठनों के निहित स्वार्थ होते हैं. निश्चित रूप से ऐसे संगठनों को अपनी शक्ति का उपयोग जातियों को मजबूत करने के बजाय इनके खात्मे में करना चाहिए.
      साहू महाराज ने  15  जन. 1919   के अपने आदेश में कहा था कि उनके राज्य के किसी भी कार्यालय और गावं पंचायतों में भी दलित-पिछड़ी जातियों के साथ समानता का बर्ताव हो, यह सुनिश्चित किया जाये.उनका स्पष्ट कहना था कि छुआछूत को बर्दास्त नहीं किया जायेगा. उच्च जातियों को दलित जाति के लोगों के साथ मानवीय व्यवहार करना ही चाहिए.जब तक आदमी को आदमी नहीं समझा जायेगा, समाज का चौतरफा विकास असम्भव है.
        साहू महाराज ने कोल्हापुर के म्युनिसपल्टी के चुनाव में अछूतों के लिए सीटें आरक्षित की थी. यह पहला मौका था की राज्य म्युनिसपल्टी का अध्यक्ष अस्पृश्य जाति से चुन कर आया था. साहू महाराज ने जब देखा कि अछूत/पिछड़ी जाति के छात्रों की राज्य के स्कूल-कालेजों में पर्याप्त संख्या हैं तब, उन्होंने एक आदेश से इनके लिए खुलवाये गए पृथक स्कूल और छात्रावासों को बंद करा कर उन्हें सामान्य/ उच्च जाति के छात्रों से साथ पढने की सुविधा प्रदान की.
छत्रपति शाहू महाराज ने 1917  में विधवा पुनर्विवाह का कानून और 1919  में अंतर्जातीय विवाह को कानूनी मान्यता प्रदान की।
      छत्रपति  साहू महाराज अस्पृश्य जाति के लोगों के साथ भोजन करने में भी नहीं झिझकते थे. वे अपने आलोचकों से कहते थे कि उन्हें इस बात कि परवाह नहीं है कि वे क्या सोचते हैं ? तब,  दलित जातियों के महार समाज के लोगों को गावं में उनकी सेवा के एवज में पड़ती( अनुपजाऊ ) जमीन का एक छोटा-सा टुकड़ा देने का रिवाज था.इसे 'वतन' कहा जाता था. चूँकि, यह उनके परिवार की आवश्यकता के लिए जरा भी पर्याप्त नहीं था. अत: गावं के लोग महारों को कुछ अनाज देते थे. इसे 'बलुता' कहा जाता था. महार वतन और बलुता ऐसी प्रथा थी कि महार समाज के लोग गावों में बलात-श्रम के लिए बाध्य थे.साहू महाराज ने 25  जून 1918  को एक आदेश निकाल कर इस प्रथा को अपराध करार दिया.
         देश में चल रहे आजादी के आन्दोलन के सन्दर्भ में साहू महाराज का तर्क था कि ब्रिटिश हुकूमत से  आजादी उन्हें  भी चाहिए. मगर, इसके साथ ही वे ब्रिटिश सरकार से इस बात का  वादा चाहते थे कि आजाद भारत में किसी खास वर्ग का एकाधिकार नहीं होगा. सत्ता हस्तांतरण के पहले दलित और पिछड़ी जातियों की सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए.
      ये छत्रपति साहू महाराज ही थे जिन्होंने बालक भीमराव आंबेडकर को विलायत भेजने में अहम भूमिका अदा की. महाराजाधिराज को बालक भीमराव के तीक्ष्ण बुध्दि के बारे में पता चला तो वे खुद बालक भीमराव का पता उठा कर मुम्बई की सीमेंट परेल चाल में मिलने गए ताकि उन्हें किसी सहायता की जरुरत हो तो दी जा सके. छत्रपति साहू महाराज में डा. आंबेडकर के 'मूकनायक समाचार पत्र' के प्रकाशन में भी सहायता की थी. महाराजा के राज्य में कोल्हापुर के अन्दर ही दलित-पिछड़ी जातियों के दर्जनों समाचार पत्र और पत्रिकाए प्रकाशित होती थी. सदियों से जिन लोगों को अपनी बात कहने का हक नहीं था, महाराजा के शासन-प्रशासन ने उन्हें बोलने की स्वतंत्रता दी थी.
      साथियों, ये महाराजाधिराज छत्रपति साहू महाराज ही थे जिन्होंने दलित समाज को सम्बोधित करते हुए  सर्व प्रथम कहा था की उन्हें अब चिंता करने की जरुरत नहीं है. क्योंकि, उनके बीच डा. अम्बेकर जैसा उनके हितों को देखने वाला प्रखर नेता पैदा होगया है.यह घटना नागपुर की है. दलितों के राजनैतिक अधिकारों के सम्बन्ध में 30 -31  मई से  1  जून  1920 को  'अखिल भारतीय बहिष्कृत  समाज '  के बेनर तले नागपुर के कस्तूरचंद पार्क में तीन दिन का एक विशाल अधिवेशन हुआ था.इस अधिवेशन में बाबा साहेब डा. भीमराव आंबेडकर मौजूद थे.अधिवेशन की अध्यक्षता महाराजाधिराज छत्रपति साहू महाराज ने की थी. दलितों के राजनैतिक अधिकारों के सम्बन्ध में  राष्ट्रीय स्तर का यह पहला अधिवेशन था.  अधिवेशन में सम्पूर्ण भारत के दलित प्रतिनिधि उपस्थित हुए थे.
         इस अधिवेशन में राजश्री साहू महाराज का ऐतिहासिक भाषण हुआ था. आपने कहा था, समाज सेवा के पवित्र काम में नेतागिरी द्वारा अपना डमरू बजा कर दलित समाज के प्रति झूठी सहानुभूति दिखाने वाले कुछ लोग इस देश में विद्यमान हैं जो अपनी कूटनीति के द्वारा समाज की सच्ची सेवा करने वाले सेवकों का पैर खींचने का काम कर रहे हैं.दलित समाज को ऐसे नेताओं से सावधान रहना चाहिए. मैं दलित समाज की सेवा करने के लिए सदैव तैयार हूँ और भविष्य में भी सदैव तत्पर रहूंगा. मैंने अपने राज्य में दलितों के लिए कुछ काम किया है और आगे भी करता रहूंगा. मैं ब्राह्मणों का नहीं ब्राह्मणवाद का विरोधी हूँ. यह व्यवस्था अब बंद होनी चाहिए.
          आप लोगों को अस्पृश्य के शब्द से सम्बोधित किया जाता है, जो निंदनीय है. तुम लोग अस्पृश्य नहीं हो. तुम अस्पृश्य मानने वाले उन लोगों से अधिक बुध्दिमान हो, अधिक पराक्रमी, अधिक विचारवान और अधिक निस्वार्थी राष्ट्र के प्रमुख घटक के रूप में प्रसिध्द हो. मंचासीन डा. भीमराव रामजी आंबेडकर की और देख कर छत्रपति साहू महाराज ने कहा था, आपको डा. आंबेडकर जैसा ओजस्वी  विद्वान् नेता प्राप्त हो गया है. वे आपका सही दिशा में मार्ग-दर्शन करेंगे, इसका मुझे पूर्ण विश्वास है. यदि मेरा सहयोग आवश्यक समझा गया तो मैं सदैव तैयार रहूंगा.

राजश्री छत्रपति साहू महाराज  ने  ड़ॉ  आंबेडकर और भास्कर रॉव  जाधव को अग्रेजों से पृथक प्रतिनिधित्व की मांग रखने की सलाह दी थी। बाल गंगाधर तिलक ने इसका जोरदार तरीके से विरोध किया।  14  फर. 1918  को अथनी  (बेलगाँव )की आम सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि  'तेली , तांबोली  और कुणबट विधि मंडल में जा कर क्या हल चलाएंगे ?'  इसके कुछ दिन बाद पंढरपुर में एक आम सभा हुई।  वहां गाडगे बाबा उपस्थित थे।  तिलक ने उनसे आग्रह करते हुए कहा - गाडगे महाराज हमें मार्ग दर्शन  करेंगे। बाबा तिलक के आग्रह को न टाल सके और मंच पर आ कर बोले - "मैं पारित, धोबी,  पीढ़ी दर पीढ़ी आपके कपड़े धोने वाला ।  मैं आपको मार्ग-दर्शन कैसे करूं ?"  गाडगे बाबा ने तिलक की ओर देखते हुए कहा - "तिलक महाराज! आप कुछ भी करों , लेकिन हमें बामण  बना दो।  आप कहते हैं कि बामण  के अलावा किसी को भी विधि मंडल में नहीं जाना चाहिए।  इसलिए आप हमें ब्राह्मण बना दो।"

एक बार छत्रपति साहू महाराज ने बातों के प्रवाह में अपने मित्र बैरिस्टर शामरॉव केलवकर को खुद के साथ हुई  घटना का जिक्र करते हुए बतलाया था - "केवलकर ! मेरी इच्छा होती है कि सम्पूर्ण रियासत के दौरे पर निकलूँ  और प्रत्येक गाँव के महारवाड़े में जाकर भोजन करूं।"  केवलकर द्वारा महाराज को ऐसा लगने  की वजह पूछने पर राजर्षि  छत्रपति साहू महाराज ने कहा-  "सुनों केवलकर, एक बार मैं सतारा गया था।  वहां हमारे लिए भोजन बन रहा था।  जहाँ भोजन बन रहा था , मैं देखने के लिए गया कि कितनी देर है। तभी,  एक ब्राह्मण रसोइए  ने मुझे रोक दिया। उसने कहा- 'यहाँ घूमने नहीं दिया जायेगा।  आपके छूने से भारी गड़बड़ होगी।'  अब सोच लो, अस्पृश्यों के साथ क्या होता होगा ? इसीलिए मुझे लगता है कि मैं  खुद प्रत्येक गाँव के महारवाड़े में जाकर भोजन करूं।"

महाराज के अस्तबल में गंगाराम कांबले नाम का एक कर्मचारी था।  वह महार जाति का था। एक दिन जोरों की प्यास लगने पर पानी मांगा। किन्तु किसी ने उसको तवज्जो नहीं दी।  तब उसने कुछ दूरी पर रखे घड़े से पानी निकाल  कर पी  लिया।  किन्तु तब यह दूसरों को मालूम हुआ तो लोगों ने उसे पीट -पीट कर अधमरा कर दिया।  मामला राजर्षि छत्रपति महाराज के पास पहुंचा।  महाराज ने संबंधित कर्मचारियों की जमकर  धुनाई की।  गंगाराम काम्बले के साथ  और कोई अनहोनी घटना न हो इसलिए महाराज ने उसे सेवामुक्त कर दिया।  किन्तु  गंगाराम काम्बले के सामने रोजी-रोटी का प्रश्न मुंह बाए खड़ा था।  महाराज ने उसे आवश्यक पूंजी देकर होटल खोलने को कहा।  सवाल था कि गंगाराम काम्बले के होटल में जाता कौन ?  महाराज ने एक तरीका निकला।
महाराजा प्रतिदिन तुलजा भवानी के दर्शन को जाया करते थे। अब उनका रथ गंगाराम काम्बले के होटल  जिसे महाराजा ने ' सुधारक होटल' नाम दिया था , प्रतिदिन रुकने  लगा। महाराजा आदेश देते - गंगाराम! 25  फूल फक्कड़ चाय।
तुकाराम बुआ आण्णा जी गणेशचार्य जो 3 री पास थे, को शाहू महाराज ने कचहरी में लिपिक का काम करने का अधिकार पत्र दिया।  यह देख ब्राह्मण कुपित हुए। लिखना-पढ़ना तो अब तक ब्राह्मणों का एकाधिकार था।  एक ब्राह्मण के इसी तरह की शिकायत करने पर महाराज ने उससे कहा-  आप अपना मुकदमा उनके पास मत  जाइए।  जब बात नहीं बनी तो दूसरे ब्राह्मण कचहरी प्रमुख ने राज दरबार को प्रेषित गोपनीय रिपोर्ट में टीप लिखा- 'महाराज द्वारा नियुक्त नया कर्मचारी बिलकुल निकम्मा है।  उसे कुछ नहीं आता।'
शाहू महाराज ने कचहरी प्रमुख को नोटिस भेजा - 'आप कचहरी प्रमुख हैं और मेरी दृष्टि में आप अत्यंत दक्ष हैं। आपकी कार्य-दक्षता को देखते हुए मैंने उस व्यक्ति को आपके पास  भेजा है। किन्तु आपका गोपनीय पत्र आपकी योग्यता पर प्रश्न खड़ा करता है।अगले 15  दिन के अंदर अगर उस व्यक्ति के कार्य में सुधार नहीं हुआ तो आपका एक महीने का वेतन काट लिया जायेगा। हो सकता है , आपको आगे चल कर अपना पद भी छोड़ना पड़े।

एक बार राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज की पत्नी लक्ष्मी बाई ने 'चातुर्मास ' व्रत में भागवत कथा कराने का आग्रह किया।  शाहू महाराज समझते रहे कि  भागवत कथा में कुछ धरा नहीं है किन्तु रानी साहिबा मानने को तैयार नहीं थी। दरअसल, उन्होंने बड़ी रानी साहिबा से अनुमति ले ली थी।  महाराजा ने बड़ी रानी साहिबा से कहा कि वह 'मत्य पुराण' का पाठ  अवश्य करवाये। पीठिका पर बैठे ब्राह्मण ने जब 70  वें अध्याय को पढ़ा तो बड़ी रानी साहिबा चप्पल लेकर ब्राह्मण को मारने दौड़ पड़ी।  बीच बचाव करते हुए शाहू महाराज ने ब्राह्मण को चले जाने को कहा।      

       छत्रपति साहू महाराज ने राजाराम कालेज की स्थापना की थी. उन्होंने कोल्हापुर में गैर-ब्राह्मण जाति के बच्चों के लिए जगह-जगह छात्रावास खोले थे.बच्चों की शादी को उन्होंने प्रतिबंधिंत  किया. उन्होंने विधवा विवाह और अंतर्जातीय-विवाह को प्रोत्साहित करने के लिए उल्लेखनीय कार्य किया था. उन्होंने पहल करके कई गैर-ब्राह्मण युवकों को पुजारी बनने के लिए प्रशिक्षित किया.

कोल्हापुर रियासत को पहलवानी के लिए जाना जाता था. यह छत्रपति साहू महाराज की देन थी. महाराज स्वयं एक मल्लयोद्धा थे। अकेले कोल्हापुर में 200 अखाड़े थे। राजश्री साहू महाराज एक विजनरी पर्सनालिटी थे। तब, उन्होंने कोल्हापुर में एक बड़े डेम का निर्माण किया था. सिंचाई परियोजना का यह ऐसा कदम था जिसकी शुरुआत साहू महाराज ने की थी. उनकी अमूल्य सेवाओं को देखते हुए कानपूर के विशाल अधिवेशन में कुर्मी समाज के लोगों ने 21 अप्रेल 1991 को उन्हें  राजश्री पदवी से सुशोभित किया था.
एक बार शिकार हेतु शाहू महाराज कटकोल गए।  वहां के स्थानीय निवासियों ने महाराज को इलाके की अपराधी जातियों (समाज से बहिष्कृत उपेक्षित घुमन्तु लोग )की शिकायत की।  महाराज ने उन सबको तत्काल पेश करने का आदेश दिया। अधिकारीयों ने सभी अपराधी  जातियों को पकड़ कर महाराज के सामने पेश किया।  महाराज के पूछने पर अपराधी जातियों के लोगों ने कहा कि काम के अभाव में वे वैसा करते हैं। महाराजा ने कहा कि लोगों को काम मिले, यह तो राज्य का धर्म है। शाहू महाराज उन सब अपराधियों को लेकर कोल्हापुर लाये और सोनतली कैंप के पास उन्हें रहने की जगह दी। शाहू महाराज ने उन्हें अलग-अलग तरह के रोजगार मुहैया कराये।
एक बार महाराजा जब कर्नाटक के दौरे पर थे, उस समय वहां के महाराजा द्वारा  इसी तरह की उपेक्षित घुमन्तु जातियों के लोगों को कोड़े मारने के लिए राज दरबार में खड़े किया गया था। शाहू महाराज ने कर्नाटक महाराजा से कह कर उन सब को अपनी रियासत कोल्हापुर लाये।  महाराजा ने उन्हें एक पहाड़ी से पत्थर निकालने में भिड़ा दिया।  तब काफी पत्थर इकट्ठे हो गए तो महाराजा ने 'राधानगरी ' नामक  एक बड़ा बांध बंधवाया।  
           राजश्री छत्रपति साहू महाराज का निधन  48 वर्ष की अल्पायु में ही 6  मई सन 1922 को  मुम्बई के पनहाला  लॉज में हो गया था. मगर, इतनी अल्पायु में ही उन्होंने सामाजिक परिवर्तन की दिशा में जो क्रन्तिकारी उपाय किये, वह इतिहास में याद रखा जायेगा.
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1.  आधार ग्रन्थ - लोकराजा  राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज: लेखक-  डी आर  ओहोल  मूलनिवासी पब्लिकेशन ट्रष्ट,  पुणे  

ज्ञानेश्वर का पूरा नाम ज्ञानेश्वर विठ्ठलपंत कुलकर्णी था।
     

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