Friday, November 23, 2012

ओमप्रकाश वाल्मीकि से एक मुलाकात(Omprakash Valmiki)

ओमप्रकाश वाल्मीकि से एक मुलाकात

पता नहीं अच्छे लोगों को क्या हो जाता है। बात अक्टू  12 के मध्य की है। डा हेमलता महिस्वर ने पूछा था कि ओमप्रकाश वाल्मीकि जी बीमार है और वे  हास्पीटल में एडमिट है। वे उनका हाल-चाल जानने जा रही है और अगर मैं अगर चलना चाहूँ तो राजीव चौक में मिल सकता हूँ। डा हेमलता की खबर से मैं उछल पड़ा। तब मेरा आवास गुरगांव दिल्ली का रीजेंसी पार्क 2 था।

ओम प्रकाश वाल्मीकि को मैं अरसे से जनता हूँ। मगर, उनसे रुबरुं होने का मौका नहीं मिला था। लेखन या चिंतन क्षेत्र में मैं कोई हस्ती तो हूँ नहीं कि ओमप्रकाश वाल्मीकि जैसे देश के ख्यात प्राप्त लेखक और सामाजिक चिन्तक के साथ डायस शेयर करने का मौका मिले। डायस शेयर तो दूर की बात,अब तक दर्शक दीर्घा में बैठने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हो सका है।

लेखन के क्षेत्र में दिलचस्पी होने के कारण पत्र -पत्रिकाएँ पढ़ते रहता हूँ। उनके लेख मुझे अपने चिंतन को सपोर्ट करते लगे। उन्हें पढ़ कर मुझे लगा कि श्यौराज सिंह बैचैन , ओमप्रकाश वाल्मीकि जैसे चिंतक दलित समाज को और दलित साहित्य को एक दिशा दे सकते हैं। मैंने कई लेखकों और समाज चिंतकों को पढ़ा। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने चिंतन के क्षेत्र में, लेखन के क्षेत्र खास कर दलित साहित्य में जो मुकाम हासिल किया है, नि:संदेह बेमिशाल है। वे जो हैं, वहीँ लिखते हैं। कुछ लोग लिखते कुछ हैं और उनके घर में कुछ और होता है। विचारों में और व्यक्तित्व में एकरूपता बहुत जरूरी है।आपको लोगों को समझने के लिए उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानना जरुरी  नहीं होता। आत्मकथा और आलोचनात्मक लेख काफी होते हैं।

बहरहाल,बतलाए मेट्रो स्टेशन पर हम नियत समय पर पहुँच गए। मिसेज भी साथ थी। मै जब भी किसी  हस्ती से मिलने जाता हूँ तो मिसेज को भी साथ रखता हूँ। परिवार के वैचारिक समृद्धता के लिए यह एक कारगर कदम है। डा हेमलता जी हमारा इन्तजार ही कर रही थी। हम करोल बाग़ मेट्रो स्टेशन से उतर कर सीधे सर गंगा राम हास्पिटल गए। मगर, पता चला कि वे यहाँ नहीं सिटी हास्पिटल में एडमिट है।

डा हेमलता को देख कर ओमप्रकाश जी के चेहरे पर हर्ष की लहर दौड़ गई। वे सिरहाने के तरफ थोडा खिसक कर तकिए के सहारे और सीधे हो गए। वहां पलंग के पास मिसेज और मिस्टर विजय पाल , डा राज कुमार पहले से ही मौजूद थे। बाद में एक और सज्जन आ गए थे जिनके अंडर में वाल्मीकि जी किसी समय सरकारी मुलाज़िम  थे। मरीज के पास अगर कोई बात करने वाला हो, तो अच्छा लगता है। मरीज लेखक हो और उनके पास तीन -चार और लेखक बैठे हो तो फिर लेखक मरीज, मरीज न रह कर लेखक बन जाता है। यहाँ लेखक भी थे और यार भी थे। बाते चलती रही और चलती रही। इस बीच मिसेज वाल्मीकि कब कमरे से निकल कर हस्पिटल के सिटिंग हाल में आ गई, पता ही नहीं लगा।
करीब डेढ़ घंटा हो गया। इस बीच हास्पिटल की नर्स दो बार चक्कर लगा गई। शायद, विजिटिंग आवर्स ख़तम हो गया था। हमें लगा कि  ज्यादा देर रुकना न सिर्फ मरीज के लिए उचित है वरन, हास्पिटल का डिसिप्लिन भी बाधित होता है। लिहाजा हमने ओमप्रकाश जी से विदा लेना ठीक समझा।

ओमप्रकाश जी को उनकी इथोपेगस नली में केंसर बताया गया था। इफेक्टेड़ पोरशन रिमूह कर लिया गया था। इसी तारतम्य में इलाज चल रहा था। वे काफी कमजोर लग रहे थे। लिक्विड डाईट चल रहा था और मैं उनकी समर्थता की असमर्थता को टुकुर-टुकुर देख रहा था। मैं कभी उनके चेहरे को देखता तो कभी उनकी रचना-धर्मिता पर चिंतन करता। मगर, ओमप्रकाश जी है कि दिल खोल कर चहक रहे थे। जिन लोगों को देह और गेह का भान  हो जाता है, वे इसी तरह मस्त रहते हैं।
इस घटना के करीब 10-15 दिनों बाद फिर एक दिन डा हेमलता का फोन आया कि वे ओमप्रकाश जी से मिलने जा रही है। भला, मैं कैसे मिस कर सकता था। इस बार मिस्टर महिस्वर भी साथ में थे। हम तीनों नोयडा सिटी सेंटर से ऑटो लेकर खोजते-खोजते वाल्मीकि जी के आवास पर पहुँच ही गए। उस समय वे केंद्रीय विहार 2 सेक्टर 82 के पाकेट 1 में रहते थे। किसी शहर में पहले-पहल किसी अजीज का एड्रेस खोजना एक चुनौती पूर्ण कार्य होता है। दरअसल, तब वे वहां अपने रिश्तेदार के यहाँ ठहरे हुए थे। डा महिस्वर ने पहले ही उन्हें आने की सूचना  दे दी थी।

मिसेज वाल्मीकि का सहारा ले कर जब वे ड्राईंग रूम में तशरीफ़ लाये तो वे काफी कमजोर लग रहे थे। वे ड्राईंग रूम  में हम लोगों के साथ काफी  देर बैठे। हम लोगों के बीच विभिन्न विषयों पर लम्बी बातचीत हुई। डा हेमलता महिस्वर से उनकी पुरानी जान -पहचान थी। शायद, वे कई मौकों पर डायस भी शेयर कर चुके थे। मैंने देखा कि इतने बीमार होने के बावजूद उनके चहरे का नूर जरा भी निस्तेज नहीं था।
कभी समय था कि केंसर का नाम सुनते ही लोग निराश हो जाते थे। मगर, जय हो युवराज का कि उन्होंने  एक नया संदेश दिया। युवराज ने लोगों के सोचने का नजरिया बदल दिया। देश के करोड़ों-करोड़ों दलित ओमप्रकाश जी के साथ हैं। मुझे जानकारी है की वे तेजी से रीकव्हर हो रहे हैं। वे इस बदतमीज बीमारी से जल्दी ही मुक्ति पा लेंगे, इसी दुआ के साथ।
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ओम  प्रकाश वाल्मीकि की कुछ कविताएं

(1 )

मरते-मरते मेरा बाप
थमा गया
मेरे हाथ में कलम
झाड़ू की जगह
काल-ग्रस्त अंधेरों की सिसकियाँ
और मुक्ति का घोषणा-पत्र
लिखने के लिए
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