Monday, April 23, 2018

खिनाराम बोरकर

खिनाराम बोरकर
खिनाराम बोरकर 
खिनाराम बोरकर 'टेलर साहेब' के नाम से जाने जाते हैं। दरअसल वे कपडे सिला करते थे। ऐसा नहीं हैं कि यही उनके परिवार की जीविका थी। वे एक बड़े किसान के बेटे थे। शायद, किसानी में उनका मन रमता नहीं था। या तो वे किसी सामाजिक चर्चा में होते अथवा सत्संग/भजन मंडळी में और इसलिए लोग उन्हें 'टेलर साहेब ' के नाम से बुलाया करते हैं।

टेलर साहेब मेरे पैतृक गावं सालेबर्डी से सटे हुए येरवाघाट के रहने वाले थे। उनके पिता तुकाराम बोरकर बड़े किसान थे। टेलर साहेबजी का जन्म सन 1927 में हुआ था। आपने 4 थी प्रायमरी तक शिक्षा प्राप्त की थी। टेलर साहेब, एक बहुत ही सादे स्वभाव के और मिलनसार व्यक्तित्व के धनी है।  वे संत घराने से तब से हैं, जबसे उनकी शादी हुई थी। अपनी शादी के बारे में, टेलर साहेब ने एक बड़ी दिलचस्प घटना सुनाई थी-

बालकदास साहेब पूर्व में रामानंदी पंथ के थे। गुरूजी के पिता बपेरा(महाराष्ट्र) निवासी  वासनिक  परिवार से थे । गुरूजी और कचेखनी के फलिराम साहेब गुरु-भाई थे। फलिराम साहेब के पिताजी का नाम पंडित गुणाराम था। वे मेश्राम(सातदेवे) थे। इस संत-घराने के गुरु रामदास साहेब थे। फलिराम साहेब पंडिताई का काम करते थे। पंडिताई का पेशा इन्हें बाप-दादाओं से मिला था। पंडिताई का कार्य करने के कारण लोग उन्हें 'बाबाजी' कहते थे।

फलिराम बाबा का आना-जाना टेलर साहेब के यहाँ होता था। उस समय टेलर साहेब विधुर थे।  उनकी पत्नी किसी बीमारी की वजह से चल बसी थी। यद्यपि टेलर साहेब के पिताजी चाहते थे कि लड़का दूसरी शादी  करले मगर, टेलर साहेब को कोई लडकी पसंद  नहीं आ रही थी। इसी बीच टेलर साहेब को फलिराम बाबा की लडकी भा गई। टेलर साहेब ने अपनी इच्छा से पिताजी को अवगत कराया। मगर, यहाँ एक जबर्दस्त पेंच था। फलिराम बाबा संत थे और वे चाहते थे की उनकी लडकी का विवाह संत घराने में ही हो।

बालकदास साहेब तब रामानंदी पंथ के महंत थे।  वे अक्सर महाराष्ट्र और म.प्र. से जुड़े क्षेत्र; भंडारा-बालाघाट में प्रवचन/कीर्तन करने आया-जाया करते थे। तब, उनके सिर पर लम्बी-लम्बी जटा हुआ करती थी। तब, वे बीडी का कारखाना भी चलाया करते थे। कीर्तन/प्रवचन और बीड़ी ठेकेदारी के कारण वे इधर आया-जाया करते थे।

काफी समय के बाद टेलर साहेब बाबाजी की लड़की पसंद आयी थी। उन्होंने पिताजी को कह दिया था कि अगर बाबाजी संत घराने में ही लडकी देना चाहते हैं तो वे संत बनने तैयार है। टेलर साहेब के पिता तुकारामजी को माजरा समझते देर नहीं लगी। संतान के नाम पर टेलर साहेब अकेली संतान थे। उन्होंने बपेरा के बालकदास साहेब को जांचा-परखा था।  पिताजी ने उन्हें आमंत्रित किया और विधि-विधान से परिवार के लोगों ने गुरु-दीक्षा ली।

गुरु-दीक्षा लेने के विधि-विधान के बारे में टेलर साहेब ने बताया कि तब,  कमरे के दरवाजे-खिड़कियाँ सब बंद कर दिए जाते थे, जब गुरु शिष्य के कान में फूंक मार कर 'तिनका तोड़ने' का तारक मंत्र देते थे। उधर, भजन मंडळी जोर-जोर से ढोलक-मंजीरे की ताल पर भजन गाती थी ताकि तारक-मन्त्र को कोई सुन न लें ।


सनद रहे, संत बनना सहज नहीं होता। संतों को कड़े आचरण और नियमों का पालन करना होता है। मांस खाना और मद का सेवन वर्ज्य होता है। घर और बाहर तन-मन से शुध्दता रखनी पडती है। यहाँ तक कि  अगर कहीं आप जाते हैं, फिर चाहे नजदीकी रिश्तेदारी में क्यों न हो, खाना आपको खुद पकाना होता है।

बहरहाल, फलिराम बाबा की पुत्री से टेलर साहेब का विवाह हुआ। यह घटना 1949 की है। पीढ़ियों से चले आ रहे संत घराने में पली-बढ़ी लडकी नए-नए संत बने घर में बहू बन कर आयी तो उसे कई चीजें अटपटी लगी । एक दिन हुआ ये कि बहू ने पानी गरम करने का बर्तन, रसोई में खाना बनाने के चूल्हे पर देख लिया।  तब, मिटटी के बर्तन हुआ करते थे।  टेलर साहेब बताते हैं कि उस ज़माने में, संतों के घरों में दो चूल्हे होते थे- एक रसोई में खाना बनाने का और दूसरा, रसोई के बाहर स्नान वगैरे के लिए पानी गर्म करने का । रसोई वाले चूल्हे को सबेरे-सबेरे घर की बहू को स्नान-ध्यान कर छुई से लीपना-पोतना पड़ता था और तब, उसमें आग जलाई जाती  थी। टेलर साहेब को जब पत्नी ने शिकायत की और कहा कि ऐसा उसने इसके पहले भी एक-दो बार देखा है तो  उन्हें बड़ा गुस्सा गया। उन्होंने गुस्से-गुस्से से लकड़ी का डंडा पकड़ा और रसोई में जो भी बर्तन दिखे,फोड़ डाला ।

उधर, पिताजी ने जब यह देखा तो उन्हें बड़ा गुस्सा आया। उन्होंने मुझे घर से निकल जाने को कहा। तैश में, मैं भी घर से निकलकर आपके गावं सालेबर्डी चला आया और एक रिश्तेदार के यहाँ ठहर गया। पिताजी का गुस्सा जब शांत हुआ तब उन्होंने करीबी 2-3 लोगों के साथ मेरे घरवाली को मुझे मनाने भेजा। 

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